वो लड़की!

यूँही कभी याद आजाती है वो लड़की जो उस दिन मिली थी,

जिसकी होठों की लालिमा उसके आँचल से ढकी थी,

जो मेरे कुछ कहने से पहले ही सहसा हंस पड़ी थी,

जिसकी मुस्कुराहट मेरे हृदय के एक कोने में घर कर गई थी,

कहीं वो तुम तो नहीं?

 

क्या वही हो तुम जिसने मुझको सिखाया था हँसना,

मुझ तिनके को सहारा देकर जिसने बनाया था अपना,

अपना समझ के जिसने बताया मुझे अपना हर सपना,

जो हर संध्या मुझे याद दिलाती की अपना ख़याल रखना,

क्या तुम वही तो नहीं?

 

मुझे तुममें उस देवी की झलक तो दिखती है,

जिसके महक उसके आने के मीलों दूर से ही लगने लगती है,

जिसके चेहरे के तेज से फूलों की बगिया महक उठती है,

जिसकी बोली सुनके कोयल भी चहकने लगती है,

क्या तुम वही हो?

 

तुम हो तो वही, इतना महसूस होता है मुझको,

मौजों से अटखेलियाँ करते देखा था जिसको,

जिसके मुस्कुराहट उसके आँचल से ढकी थी,

जो मुझे देख यूँही हंस पड़ी थी,

हाँ तुम वही तो हो!

 

पर तुम्हारे इस चेहरे की चमक को हुआ क्या?

कहाँ गई वो मुस्कान, कहाँ खो गई, उसका रहा क्या?

क्यूँ बैठो हो ऐसे बाहों में मुख छिपाए, किसिने कुछ कहा क्या?

चहकने के बजाए सिसकियों में गुज़र रहे दिन, तुम्हें हुआ क्या?

कुछ तो कहो।

 

इसके आगे उससे और ना सुना गया और वह चल पड़ी,

मैंने उससे विनती की रुकने को और एक घड़ी,

पर वह चलते हुए बस दूर शितिज पे जाके हुई खड़ी,

मुझपे एक आख़री बार नज़र डालके रोई और फिर हंस पड़ी,

कुछ जवाब ना मिला, पर ऐसा लगा मानो कह गई- अब तुम सहो!